15 अगस्त: क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं या सिर्फ झंडा फहराने के लिए स्वतंत्र हैं?
15 अगस्त आते ही हम अचानक से देशभक्त बन जाते हैं। सुबह हमारे हाथ में तिरंगा होता है, सोशल मीडिया पर देशभक्ति के स्टेटस होते हैं, राष्ट्रगान बजता है, और हम गर्व से कहते हैं—“हम स्वतंत्र हैं।” हम तिरंगे के सामने खड़े होकर एकता की बात करते हैं। लेकिन तिरंगे से बाहर निकलते ही पूछते हैं—“तुम कौन हो?” जाति क्या है? धर्म क्या है? कहाँ से हो? कितना कमाते हो? किसके आदमी हो? शायद हमें अगली बार तिरंगा फहराने से पहले खुद से एक और सवाल पूछना चाहिए—“क्या मेरे अंदर का इंसान स्वतंत्र है?” क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? या फिर हमारी स्वतंत्रता सिर्फ 15 अगस्त की छुट्टी तक सीमित है? क्योंकि जिस देश में एक इंसान दूसरे इंसान से पहले उसकी जाति पूछता है, जहाँ धर्म देखकर दोस्ती और दुश्मनी तय होने लगती है, जहाँ कोई कहता है “मैं बिहारी हूँ”, कोई “मैं दिल्ली का हूँ”, कोई “मैं इस राज्य का हूँ”—और धीरे-धीरे “भारतीय” होना पीछे छूट जाता है… हम अंग्रेजों से स्वतंत्र हुए, अपनी सोच से नहीं 1947 में अंग्रेज चले गए। लेकिन आज भी हम एक-दूसरे को जाति के नाम पर बाँटते हैं। धर्म के नाम पर बाँटत...